नान्यत् ते कामये राजन्वदान्याज्जगदीश्वरात् ।
नैन: प्राप्नोति वै विद्वान्यावदर्थप्रतिग्रह: ॥ १७ ॥
अनुवाद
हे समग्र ब्रह्माण्ड के नियंत्रक, राजा! यद्यपि आप अत्यंत उदार हैं तथा मुझे इच्छानुसार जितनी भूमि चाहिए, दे सकते हैं, किंतु मैं आपसे ऐसी कोई अनावश्यक वस्तु नहीं माँगना चाहता। यदि कोई विद्वान ब्राह्मण अन्यों से अपने आवश्यकतानुसार दान लेता है तो वह पापपूर्ण कर्मों में नहीं फँसता।
O King who is the regulator of the entire universe! Although you are very generous and can give me as much land as I want, I do not want to ask anything unnecessary from you. If a learned Brahmin takes gifts from others as per his need, he does not get trapped in sinful activities.
तात्पर्य
एक ब्राह्मण या संन्यासी दूसरों से दान लेने के योग्य होते हैं, लेकिन अगर वह आवश्यकता से अधिक लेता है तो वह दंडनीय होता है। कोई भी सर्वोच्च भगवान की संपत्ति का आवश्यकता से अधिक उपयोग नहीं कर सकता। भगवान वामनदेव ने अप्रत्यक्ष रूप से बलि महाराज को संकेत दिया कि वह आवश्यकता से अधिक भूमि पर कब्जा कर रहे थे। भौतिक संसार में, सभी संकट अतिरेक के कारण होते हैं। धन को अत्यधिक अर्जित करता है और इसे अत्यधिक खर्च भी करता है। ऐसी गतिविधियाँ पापपूर्ण होती हैं। सारी संपत्ति भगवान की सर्वोच्च व्यक्तित्व की है और सभी जीव जो सर्वोच्च भगवान के पुत्र हैं, उन्हें सर्वोच्च पिता की संपत्ति का उपयोग करने का अधिकार है, लेकिन कोई व्यक्ति ज़रूरत से ज़्यादा नहीं ले सकता। यह सिद्धांत विशेष रूप से ब्राह्मणों और संन्यासियों द्वारा पालन किया जाना चाहिए जो दूसरों की कीमत पर जीते हैं। इस प्रकार वामनदेव एक आदर्श भिखारी थे, क्योंकि उन्होंने केवल तीन कदम भूमि माँगी थी। बेशक, उसके कदम और एक साधारण मनुष्य के कदम में अंतर है। भगवान, अपनी अचिंतनीय वीरता से, अपने कदमों की असीमित माप से ऊपरी, निचली और मध्य ग्रह प्रणालियों सहित पूरे ब्रह्मांड पर कब्जा कर सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥