श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  8.19.13 
वैरानुबन्ध एतावानामृत्योरिह देहिनाम् ।
अज्ञानप्रभवो मन्युरहंमानोपबृंहित: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु के प्रति हिरण्यकशिपु का क्रोध उसकी मृत्यु तक बना रहा। ठीक उसी तरह, देहात्मबुद्धि वाले अन्य लोग मिथ्या अहंकार और अज्ञान के प्रबल प्रभाव के कारण ही क्रोध बनाए रखते हैं।
 
Hiranyakshipu's anger against Lord Viṣṇu continued until his death. Others with bodily consciousness maintain anger only due to the strong influence of false ego and ignorance.
तात्पर्य
सामान्यतः यद्यपि बद्ध प्राणी क्रोधित रहता है, उसका क्रोध स्थायी नहीं अपितु अस्थायी होता है। यह अज्ञान के प्रभाव के कारण उत्पन्न होता है। किंतु हिरण्यकशिपु ने मृत्यु पर्यंत भगवान विष्णु के प्रति अपनी शत्रुता और क्रोध को बनाये रखा। उसने अपने भाई हिरण्याक्ष के वध के लिए विष्णु के प्रति अपने प्रतिशोधात्मक रवैये को कभी नहीं भुलाया। शारीरिक जीवन की अवधारणा में अन्य लोग अपने शत्रुओं पर क्रोधित होते हैं लेकिन भगवान विष्णु पर नहीं। किंतु हिरण्यकशिपु हमेशा क्रोधित रहता था। वह केवल मिथ्या प्रतिष्ठा के कारण ही नहीं अपितु विष्णु के प्रति निरंतर शत्रुता के कारण भी क्रोधित रहता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)