श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  8.19.12 
अपश्यन्निति होवाच मयान्विष्टमिदं जगत् ।
भ्रातृहा मे गतो नूनं यतो नावर्तते पुमान् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
उन्हें न देखकर हिरण्यकशिपु बोला : मैंने पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर डाली, लेकिन अपने भाई के हत्यारे विष्णु को कहीं नहीं ढूँढ पाया। अतः वह निश्चित रूप से उस स्थान पर चला गया होगा जहाँ से कोई नहीं लौट सकता (दूसरे शब्दों में, वह अब मर चुका होगा)।
 
Not seeing him, Hiranyakashipu said: I have searched the entire universe, but I could not find Vishnu, the killer of my brother. Therefore, he must have gone to a place from where no one can return (i.e. he must have died now).
तात्पर्य
नास्तिक लोग आम तौर पर बौद्ध दार्शनिक निष्कर्ष का अनुसरण करते हैं कि मृत्यु के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है। हिरण्यकशिपु, एक नास्तिक होने के कारण, इसी तरह सोचता था। क्योंकि भगवान विष्णु उसे दिखाई नहीं देते थे, इसलिए उसने सोचा कि भगवान मर गए हैं। आज भी, बहुत से लोग इस दर्शन का अनुसरण करते हैं कि भगवान मर चुके हैं। लेकिन भगवान कभी मरते नहीं। यहाँ तक कि जीव, जो ईश्वर का ही एक भाग है, कभी मरता नहीं है। न जायते म्रियते वा कदाचित: "आत्मा के लिए कभी जन्म या मृत्यु नहीं होती।" यह भगवद्-गीता (2.20) का कथन है। साधारण जीव भी कभी जन्म नहीं लेता या मरता नहीं है। तो फिर परमेश्वर के व्यक्तित्व का क्या कहना जो सभी जीवों के प्रमुख हैं? वह निश्चित रूप से कभी जन्म या मृत्यु नहीं लेते। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा (भगवद् गीता 4.6)। भगवान और जीव दोनों ही अजन्मे और अविनाशी व्यक्तियों के रूप में विद्यमान हैं। इस प्रकार, हिरण्यकशिपु का यह निष्कर्ष कि विष्णु मर चुके हैं, गलत था। जैसा कि यतो नावर्तते पूमन शब्दों से संकेत मिलता है, निश्चित रूप से एक आध्यात्मिक राज्य है, और यदि जीव वहाँ जाता है, तो वह कभी इस भौतिक संसार में नहीं लौटता। भगवद्-गीता (4.9) में भी इसकी पुष्टि की गई है: त्याक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन। भौतिक रूप से, प्रत्येक जीव मरता है; मृत्यु अपरिहार्य है। लेकिन जो कर्मी, ज्ञानी और योगी होते हैं वे मृत्यु के बाद इस भौतिक संसार में लौट आते हैं, जबकि भक्त नहीं लौटते। बेशक, यदि कोई भक्त पूरी तरह से परिपूर्ण नहीं होता है तो वह भौतिक दुनिया में फिर से जन्म लेता है, लेकिन बहुत ही ऊँचे स्थान पर, या तो एक अमीर परिवार या शुद्ध ब्राह्मणों के परिवार में (शुचीनां श्रीमतां गेहे), बस अपनी आध्यात्मिक चेतना के विकास को समाप्त करने के लिए। जिन्होंने कृष्ण चेतना का पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है और वे भौतिक इच्छा से मुक्त हैं, वे भगवान के व्यक्तित्व के निवास स्थान पर लौट आते हैं (यद गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमं मम)। यहाँ वही तथ्य बताया गया है: यतो नावर्तते पूमन। कोई भी व्यक्ति जो घर वापस जाता है, भगवान के पास वापस जाता है, वह इस भौतिक संसार में वापस नहीं आता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)