श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 18: भगवान् वामनदेव : वामन अवतार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  8.18.5 
श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभु: ।
सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
श्रवण-द्वादशी के दिन जब चन्द्रमा श्रवण राशि में था और शुभ अभिजित मुहूर्त था, उस समय भगवान इस ब्रह्माण्ड में प्रकट हुए। भगवान् के प्रादुर्भाव को अत्यंत शुभ मानते हुए, सूर्य से लेकर शनि तक सभी तारे और ग्रह बहुत दानी हो गए।
 
On the day of Shravan Dwadashi when the moon was in Shravan sign and it was the auspicious Abhijit muhurta, God appeared in this universe. Considering the appearance of God as very auspicious, all the stars and planets from the Sun to Saturn etc. became very generous.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, एक विशेषज्ञ ज्योतिषी, नक्षत्र-ताराध्या शब्द का अर्थ बताते हैं। 'नक्षत्र' का अर्थ है "तारे", 'तारा' इस संदर्भ में ग्रहों को संदर्भित करता है, और 'आध्या' का अर्थ है "विशिष्ट रूप से उल्लिखित पहला"। ग्रहों में सबसे पहले सूर्य है, चंद्रमा नहीं। इसलिए, वैदिक संस्करण के अनुसार, आधुनिक खगोलविदों के इस प्रस्ताव को कि चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट है, स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। जिस कालानुक्रमिक क्रम में दुनिया भर के लोग सप्ताह के दिनों - रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार - का उल्लेख करते हैं वह ग्रहों के वैदिक क्रम से मेल खाता है और इस प्रकार वैदिक संस्करण की पुष्टि करता है। इसके अलावा, जब भगवान प्रकट हुए तो ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, ग्रह और तारे भगवान के जन्म का जश्न मनाने के लिए बहुत ही शुभ स्थिति में थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)