श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  8.16.6 
अपि वातिथयोऽभ्येत्य कुटुम्बासक्तया त्वया ।
गृहादपूजिता याता: प्रत्युत्थानेन वा क्‍वचित् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
मुझे आश्चर्य है कि क्या अपने परिवार के सदस्यों के साथ बहुत अधिक जुड़ाव के कारण आप अचानक आए मेहमानों का सही तरीके से स्वागत नहीं कर पाईं, इसलिए उनका स्वागत नहीं हुआ और वे वापस चले गए?
 
I wonder if because you were too attached to your family members, you were not able to welcome the unexpected guests properly and they went back without being welcomed?
तात्पर्य
किसी अतिथि की आवभगत करना गृहस्थ का कर्तव्य होता है, चाहे वो अतिथि शत्रु ही क्यों न हो। जब कोई अतिथि हमारे घर आता है, तो उसका स्वागत उठकर और उसे आसन देकर किया जाना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है, 'गृहे शत्रुमपि प्राप्तं विश्वस्तमकुटोभयं' यानि अगर आपका कोई शत्रु भी आपके घर आए, तो उसका ऐसा स्वागत करें कि उसे लगे ही नहीं कि उसका मेज़बान उसका शत्रु है। अपनी स्थिति के अनुसार घर आए हर व्यक्ति का अच्छे से स्वागत करें। ज़रूर उसे आसन और पानी का गिलास दें, जिससे कि अतिथि नाराज़ न हों। कश्यप मुनि ने अदिति से पूछा क्या कभी ऐसे अतिथि या अथितियों का अपमान किया गया है? अथिति उस व्यक्ति को कहते हैं जो बिना निमंत्रण के आता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)