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श्लोक 8.16.42  |
जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभि: प्रभुम् ।
कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेद् दण्डवन्मुदा ॥ ४२ ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् मंत्र को मौन भाव से 108 बार जपना चाहिए और भगवान् की महिमा का गुणगान करना चाहिए। इसके बाद भगवान की परिक्रमा करनी चाहिए और अंत में अत्यंत प्रसन्नता और संतोष के साथ, डंडवत प्रणाम करना चाहिए। |
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| तत्पश्चात् मंत्र को मौन भाव से 108 बार जपना चाहिए और भगवान् की महिमा का गुणगान करना चाहिए। इसके बाद भगवान की परिक्रमा करनी चाहिए और अंत में अत्यंत प्रसन्नता और संतोष के साथ, डंडवत प्रणाम करना चाहिए। |
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