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श्लोक 8.16.22  |
श्रीअदितिरुवाच
केनाहं विधिना ब्रह्मन्नुपस्थास्ये जगत्पतिम् ।
यथा मे सत्यसङ्कल्पो विदध्यात् स मनोरथम् ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीमती अदिति ने कहा: हे ब्राह्मण! मुझे वह मार्ग बताइये जिससे मैं जगन्नाथ की पूजा कर सकूँ और भगवान् मुझसे प्रसन्न होकर मेरी सभी इच्छाओं को पूरा कर दें। |
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| श्रीमती अदिति ने कहा: हे ब्राह्मण! मुझे वह मार्ग बताइये जिससे मैं जगन्नाथ की पूजा कर सकूँ और भगवान् मुझसे प्रसन्न होकर मेरी सभी इच्छाओं को पूरा कर दें। |
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