अकामः सर्व-कामो वा
मोक्ष-काम उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम
"चाहे कोई सब कुछ चाहता हो या कुछ नहीं या भगवान के अस्तित्व में विलीन होना चाहता हो, वह केवल तभी बुद्धिमान होता है जब वह भगवान कृष्ण, भगवान का परम व्यक्तित्व, को दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान करके पूजा करता है।" (भागवत 2.3.10)
कश्यप मुनि ने देखा कि उनकी पत्नी, अदिति, अपने पुत्रों के कल्याण के लिए कुछ भौतिक इच्छाएँ रखती थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने उन्हें भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति भक्ति सेवा करने की सलाह दी। दूसरे शब्दों में, हर किसी को, चाहे वह कर्मी हो, ज्ञानी हो, योगी हो या भक्त हो, उसे अनिवार्य रूप से वासुदेव के चरण कमलों का आश्रय लेना चाहिए और उसे दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान करनी चाहिए ताकि उसकी सभी इच्छाएँ विधिवत पूरी हो सकें। कृष्ण दीन-अनुकांपन हैं: वे सभी पर बहुत दयालु हैं। इसलिए यदि कोई अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करना चाहता है, तो कृष्ण उसकी मदद करते हैं। बेशक, कभी-कभी यदि कोई भक्त बहुत ईमानदार होता है, तो भगवान, उस पर विशेष कृपा करते हुए, उसकी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने से मना कर देते हैं और उसे सीधे शुद्ध, अमिश्रित भक्ति सेवा का आशीर्वाद देते हैं। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.38-39) में कहा गया है:
कृष्ण कहें, — ‘आमाँ भजे, माँगे विषय-सुख
अमृत छाड़ी’ विष माँगे — एइ बाड़ा मूर्ख
आमि — विज्ञ, एइ मूर्खेँ ‘विषय’ केने दिबा?
स्व-चरणामृत दियाँ ‘विषय’ भुलैबा
"कृष्ण कहते हैं, 'यदि कोई मेरी दिव्य प्रेममय सेवा में संलग्न होता है लेकिन साथ ही साथ भौतिक भोग का वैभव भी चाहता है, तो वह बहुत ही मूर्ख है। वास्तव में, वह ऐसे व्यक्ति की तरह है जो जहर पीने के लिए अमृत छोड़ देता है। चूंकि मैं बहुत बुद्धिमान हूँ, तो मैं इस मूर्ख को भौतिक समृद्धि क्यों दूँ? इसके बजाय मैं उसे अपने चरण कमलों की शरण का अमृत लेने के लिए प्रेरित करूँगा और उसे भ्रामक भौतिक भोग को भुला दूँगा।'" यदि कोई भक्त कुछ भौतिक इच्छा बनाए रखता है और साथ ही साथ कृष्ण के चरण कमलों में संलग्न होने की बहुत ईमानदारी से इच्छा रखता है, तो कृष्ण उसे सीधे अमिश्रित भक्ति सेवा दे सकते हैं और उसकी सभी भौतिक इच्छाओं और संपत्ति को छीन सकते हैं। भक्तों के लिए यह भगवान का विशेष अनुग्रह है। अन्यथा, यदि कोई कृष्ण की भक्ति सेवा ग्रहण करता है लेकिन फिर भी उसकी भौतिक इच्छाएँ पूरी होती हैं, तो वह सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो सकता है, जैसा कि ध्रुव महाराज ने किया था, लेकिन इसमें कुछ समय लग सकता है। हालाँकि, यदि कोई बहुत ही ईमानदार भक्त केवल कृष्ण के चरण कमल चाहता है, तो कृष्ण उसे सीधे शुद्ध-भक्ति, अमिश्रित भक्ति सेवा का पद प्रदान करते हैं।
