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श्लोक 8.16.13  |
को नु मे भगवन्कामो न सम्पद्येत मानस: ।
यस्या भवान्प्रजाध्यक्ष एवं धर्मान्प्रभाषते ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु! आप एक प्रजापति हैं और धर्म सिद्धांतों के पालन में स्वयं मेरे गुरु हैं, तो फिर ऐसे में यह कैसे संभव हो सकता है कि मेरी सभी इच्छाएँ पूरी न हों? |
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| हे प्रभु! आप एक प्रजापति हैं और धर्म सिद्धांतों के पालन में स्वयं मेरे गुरु हैं, तो फिर ऐसे में यह कैसे संभव हो सकता है कि मेरी सभी इच्छाएँ पूरी न हों? |
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