श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 15: बलि महाराज द्वारा स्वर्गलोक पर विजय  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  8.15.28 
श्रीगुरुरुवाच
जानामि मघवञ्छत्रोरुन्नतेरस्य कारणम् ।
शिष्यायोपभृतं तेजो भृगुभिर्ब्रह्मवादिभि: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
देवोके गुरु बृहस्पति बोले: हे इंद्र, मै जानता हूं कि क्यों तुम्हारा शत्रु इतना शक्तिशाली हो गया है। भृगु मुनि के ब्राह्मण वंशज, उनके शिष्य बलि महाराज की भक्ति से खुश होकर, उन्हें ऐसी अद्भुत शक्ति प्रदान की है।
 
Brihaspati, the preceptor of the demigods, said: O Indra, I know the reason why your enemy has become so powerful. The brahmin descendants of Bhrigu Muni, pleased with his disciple Bali Maharaja, have bestowed such matchless power on him.
तात्पर्य
बृहस्पति, देवों के आध्यात्मिक गुरु ने इंद्र को सूचित किया, "आम तौर पर, बली और उनकी सेनाएं ऐसी ताक़त हासिल नहीं कर सकती थीं, पर ऐसा प्रतीत होता है कि भृगु मुनि के ब्राह्मण वंशज, बली महाराज से खुश होकर, उन्हें इस आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न कर दिया।" दूसरे शब्दों में, बृहस्पति ने इंद्र को बताया कि बली महाराज की शौर्यता उनकी अपनी नहीं थी, बल्कि उनके सर्वोच्च गुरु, शुक्राचार्य की थी। हम अपनी दैनिक प्रार्थनाओं में गाते हैं, यस्य प्रसादाद भगवत-प्रसादो यस्याप्रसादान न गतिः कुतोऽपि। आध्यात्मिक गुरु की प्रसन्नता से, व्यक्ति असाधारण शक्ति प्राप्त कर सकता है, विशेष रूप से आध्यात्मिक उन्नति में। आध्यात्मिक गुरु के आशीर्वाद ऐसी उन्नति के लिए व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रयास से अधिक शक्तिशाली होते हैं। इसलिए नरोट्टम दास ठाकुर कहते हैं:

गुरु-मुख-पद्म-वाक्य, चित्ते करिया ऐक्य,

आर न करिहा मनें आशा

विशेष रूप से आध्यात्मिक उन्नति के लिए, व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु के प्रामाणिक आदेश को पूरा करना चाहिए। परंपरा प्रणाली से, इस प्रकार व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान (एवं परंपरा-प्राप्त इमां राजर्षयो विदुः) से आने वाली मूल आध्यात्मिक शक्ति से युक्त किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)