श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  8.12.31 
तस्यासौ पदवीं रुद्रो विष्णोरद्भ‍ुतकर्मण: ।
प्रत्यपद्यत कामेन वैरिणेव विनिर्जित: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
काम-वासना के शत्रु द्वारा पीड़ित होकर शिवजी ने भगवान विष्णु का, जो अद्भुत कार्य करते हैं और जिन्होंने मोहिनी का रूप धारण कर रखा था, पीछा करना शुरू कर दिया।
 
Lord Shiva, the doer of that wonderful deed, pursued Lord Vishnu, who had assumed the form of Mohini, as if he were tormented by the enemy in the form of lust.
तात्पर्य
भगवान शिव को माया द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता। इसलिए यह समझना चाहिए कि भगवान शिव इस प्रकार से भगवान विष्णु की आंतरिक शक्ति द्वारा परेशान किया जा रहा था। भगवान विष्णु अपनी विभिन्न शक्तियों के माध्यम से कई अद्भुत क्रियाएं कर सकते हैं।

परस्य शक्तिर विविधैव श्रूयते

स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च

(श्वेताश्वतर उपनिषद 6.8)

परम भगवान के पास विभिन्न शक्तियां हैं, जिनके द्वारा वे बहुत कुशलता से कार्य कर सकते हैं। किसी भी काम को कुशलता से करने के लिए उन्हें चिंतन करने की भी आवश्यकता नहीं है। चूंकि भगवान शिव को महिला द्वारा परेशान किया जा रहा था, इसलिए यह समझना चाहिए कि यह काम किसी महिला द्वारा नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु द्वारा किया जा रहा था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)