बलि महाराज विभिन्न प्रकार के सांसारिक कार्यों में अत्यंत अनुभवी थे। जब शुक्राचार्य जी की कृपा से उन्हें होश आया और उनकी स्मृति लौट आई तो जो कुछ भी हो चुका था, वे सबकुछ समझ गए। इसीलिए पराजित हो जाने पर भी उन्हें कोई शोक नहीं हुआ।
Bali Maharaja was very experienced in worldly affairs. When he regained his senses and memory by the grace of Shukracharya, he understood what had happened. Therefore, he did not grieve even after being defeated.
तात्पर्य
यह महत्वपूर्ण है कि बाली महाराज को यहाँ बहुत अनुभवी बताया गया है। हार जाने के बावजूद वो बिलकुल भी दुखी नहीं हुए क्योंकि वो जानते थे कि भगवान के निर्देश के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। क्योंकि वो भक्त थे इसलिए उन्होंने अपनी हार बिना किसी विलाप के स्वीकार कर ली। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (2.47) में कहा है, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कृष्ण चेतना में हर किसी को बिना जीत या हार की परवाह किये अपने कर्म करना चाहिए। हमें कृष्ण या उनके प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु द्वारा आदेशित कर्म को करना चाहिए। अनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुतमाम। प्रथम श्रेणी की भक्ति सेवा में हम हमेशा कृष्ण के आदेशों और इच्छा का पालन करते हैं।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध आठ के अंतर्गत ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥