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श्लोक 8.10.2  |
साधयित्वामृतं राजन्पाययित्वा स्वकान्सुरान् ।
पश्यतां सर्वभूतानां ययौ गरुडवाहन: ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन! समुद्र-मंथन का कार्य संपन्न कर लेने के पश्चात और अपने प्रिय भक्तों अर्थात् देवताओं को अमृत पिलाने के बाद भगवान ने उन सबको वहीं छोड़ दिया और गरुड़ पर सवार होकर अपने धाम चले गए। |
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| हे राजन! समुद्र-मंथन का कार्य संपन्न कर लेने के पश्चात और अपने प्रिय भक्तों अर्थात् देवताओं को अमृत पिलाने के बाद भगवान ने उन सबको वहीं छोड़ दिया और गरुड़ पर सवार होकर अपने धाम चले गए। |
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