श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  8.1.7 
विरक्त: कामभोगेषु शतरूपापति: प्रभु: ।
विसृज्य राज्यं तपसे सभार्यो वनमाविशत् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इंद्रियभोगों के प्रति बिल्कुल भी आसक्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपने भोग-विलास वाले राज्य का त्याग कर दिया और पत्नी के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे।
 
Shatarupa's husband Swayambhuva Manu was not at all inclined towards sensual pleasures by nature. Therefore, he left his luxurious kingdom and went to the forest with his wife to perform penance.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद्-गीता (4.2) में कहा गया है, “एवं परंपरा-प्राप्तं इमं राजर्षयो विदुः”: "सर्वोच्च विज्ञान इस प्रकार शिष्य-शिष्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त हुआ, और महान संत राजाओं ने इसे उसी प्रकार समझा।" सभी मनु पूर्ण राजा थे। वे राजर्षि थे। दूसरे शब्दों में कहें तो, यद्यपि वे संसार के राजा के पद पर आसीन थे, फिर भी वे महान संतों के समान अच्छे थे। उदाहरण के लिए, स्वयंभु मनु, विश्व के सम्राट थे, फिर भी उनमें इन्द्रिय तृप्ति की कोई अभिलाषा नहीं थी। यही राजतंत्र का अर्थ है। देश का राजा या साम्राज्य का सम्राट इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि वह स्वाभाविक रूप से इन्द्रिय तृप्ति का त्याग कर दे। ऐसा नहीं है कि राजा बनने पर उसे इन्द्रिय तृप्ति पर अनावश्यक रूप से धन खर्च करना चाहिए। जैसे ही राजा नीच हो गए और इन्द्रिय तृप्ति पर धन खर्च करने लगे, वे नष्ट हो गए। इसी प्रकार, वर्तमान समय में, राजतंत्र के विलुप्त होने के बाद, लोगों ने लोकतंत्र का निर्माण किया है, जो कि असफल भी हो रहा है। अब, प्रकृति के नियमों के अनुसार, वह समय आ रहा है जब तानाशाही नागरिकों को और अधिक कठिनाई में डाल देगी। यदि राजा या तानाशाह व्यक्तिगत रूप से, या सरकार के सदस्य सामूहिक रूप से, मनु-संहिता के नियमों के अनुसार राज्य या साम्राज्य को बनाए नहीं रख सकते हैं, तो निश्चित रूप से उनकी सरकार नहीं चल पाएगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)