श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.1.32 
तत्कथासु महत् पुण्यं धन्यं स्वस्त्ययनं शुभम् ।
यत्र यत्रोत्तमश्लोको भगवान्गीयते हरि: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जो भी साहित्य या कथा में भगवान उत्तमश्लोक का वर्णन किया जाता है और उनकी महिमा का गायन किया जाता है, वह निश्चित रूप से महान, शुद्ध, पवित्र और कल्याणकारी होता है।
 
Any literature or story in which God's best verse is described and His glory is sung, is certainly great, pure, blessed, beneficial and excellent.
तात्पर्य
कृष्ण चेतना आंदोलन केवल कृष्ण का वर्णन करके पूरी दुनिया में फैल रहा है। हमने काफी सारी किताबें छापी हैं जिनमें सत्रह खण्डों में श्री चैतन्य-चरितामृत शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक खण्ड में चार सौ पृष्ठ हैं, साथ ही भगवद गीता और भक्ति रसामृत सिंधु शामिल हैं। हम साठ खण्डों में श्रीमद्भागवतम को भी छाप रहे हैं। जहाँ भी कोई वक्ता इन पुस्तकों से प्रवचन देता है और श्रोता उनको सुनते हैं, तो इससे एक अच्छी और मंगलमय परिस्थिति बनेगी। इसलिए कृष्ण चेतना आंदोलन के सदस्यों और विशेष रूप से संन्यासियों को कृष्ण चेतना का प्रचार बहुत सावधानीपूर्वक करना चाहिए। यह एक मंगलमय वातावरण बनाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)