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bhagavat 8.1.17: श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा: इस प्रकार स्वायम्भुव मनु उपनिषदों के मन्त्रों को जपते हुए समाधि में लीन हो गए। उन्हें देखकर राक्षस और असुर बहुत भूखे होने के कारण उन्हें निगलना चाहते थे इसलिए वे उनके पीछे तेज गति से दौड़ने लगे।   |   bhagavat अध्याय 8.1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु   ।   bhagavat स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  8.1.17 
श्रीशुक उवाच
इति मन्त्रोपनिषदं व्याहरन्तं समाहितम् ।
द‍ृष्ट्वासुरा यातुधाना जग्धुमभ्यद्रवन् क्षुधा ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा: इस प्रकार स्वायम्भुव मनु उपनिषदों के मन्त्रों को जपते हुए समाधि में लीन हो गए। उन्हें देखकर राक्षस और असुर बहुत भूखे होने के कारण उन्हें निगलना चाहते थे इसलिए वे उनके पीछे तेज गति से दौड़ने लगे।
 
Sukadeva Goswami further said: Thus Svayambhuva Manu went into deep meditation while chanting the mantras of the Upanishads. Seeing him, the demons and the asuras wanted to swallow him as they were very hungry. Therefore, they started running after him at a fast pace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)