"ममैवंशो जीव-लोके
जीव-भूतः सनातनः
मनः शष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृति-स्थाना कार्षति
"इस सशर्त दुनिया में जीवित इकाइयां मेरे शाश्वत, आंशिक हिस्से हैं। सशर्त जीवन के कारण, वे छह इंद्रियों के साथ बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मन भी शामिल है।" जीवित इकाइयां वास्तव में सूक्ष्म रूप हैं जो सर्वोच्च भगवान का हिस्सा और पार्सल हैं। सर्वोच्च भगवान हर चीज में पूरे हैं, और भगवान के छोटे कण भी मूल रूप से उनकी तरह ही योग्य हैं, लेकिन अपने सूक्ष्म अस्तित्व के कारण, वे भौतिक आकर्षण से संक्रमित होते हैं और इस तरह उलझ जाते हैं। इसलिए हमें ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के निर्देशों का पालन करना चाहिए, और फिर, कृष्ण की तरह, जो सृजन, रखरखाव और विनाश की अपनी भौतिक गतिविधियों से कभी नहीं उलझे, हमारे पास विलाप करने के लिए कुछ भी नहीं होगा (नवासिन्ति ये anu ताम)। कृष्ण व्यक्तिगत रूप से भगवद् गीता में निर्देश देते हैं, और इन निर्देशों का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति मुक्त हो जाता है।
कृष्ण के निर्देशों का पालन करना तब संभव है जब कोई भक्त हो, क्योंकि कृष्ण निर्देश देते हैं कि व्यक्ति को भक्त बनना चाहिए। मन-मना भव मद्-भक्तो मद्-याजी माम नमस्करु: "हमेशा मेरे बारे में सोचो और मेरा भक्त बनो। मेरी पूजा करो और मुझे अपना सम्मान दो।" (बीजी। 18.65) हमेशा कृष्ण के बारे में सोचने का मतलब है हरे कृष्ण मंत्र का जाप करना, लेकिन जब तक कोई दीक्षित भक्त नहीं बनता वह ऐसा नहीं कर सकता। जैसे ही कोई भक्त बनता है, वह देवता पूजा (मद-याजी) में संलग्न हो जाता है। एक भक्त का व्यवसाय है प्रभु और आध्यात्मिक गुरु को लगातार प्रणाम करना। यह सिद्धांत भक्ति के मंच पर आने का मान्यता प्राप्त तरीका है। जैसे ही कोई इस मंच पर आता है, वह धीरे-धीरे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझता है, और केवल कृष्ण को समझकर ही वह भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है।
