श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  8.1.15 
ईहते भगवानीशो न हि तत्र विसज्जते ।
आत्मलाभेन पूर्णार्थो नावसीदन्ति येऽनु तम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
ईश्वर स्वयं में ही पूर्ण और ऐश्वर्यशाली हैं, फिर भी वे इस भौतिक संसार के सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। इस प्रकार से कार्य करते हुए भी वे कभी इसमें उलझते नहीं हैं। इसलिए जो भक्त उनके पदचिह्नों पर चलते हैं, वे भी कभी बंधन में नहीं पड़ते।
 
The Lord is opulent for His own benefit, yet He acts as the creator, preserver and destroyer of the universe. Even though He acts in this manner, He is never bound. Therefore, the devotees who follow His footsteps are also never bound.
तात्पर्य
जैसा भगवद् गीता (3.9) में कहा गया है, "यज्नार्थत कर्मणो nyत्र लोक ay यह कर्म-बन्धनः": "विष्णु के लिए बलिदान के रूप में किए जाने वाले कार्य को संपन्न करना होगा; अन्यथा कार्य ही इस भौतिक दुनिया में हमें बांधते हैं।" यदि हम कृष्ण चेतना के अनुसार कार्य नहीं करते हैं, तो हम रेशम के कीटों की तरह अपने कोषों में उलझ जाएंगे। ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण, हमें यह सिखाने के लिए प्रकट होते हैं कि हमें कैसे कार्य करना चाहिए ताकि हम इस भौतिक दुनिया में उलझे नहीं रहें। हमारी वास्तविक समस्या यह है कि हम भौतिकवादी गतिविधियों में उलझे हुए हैं, और क्योंकि हम बाध्य हैं, एक शरीर से दूसरे शरीर में और एक जीवन प्रारूप से दूसरे जीवन प्रारूप में भौतिक अस्तित्व में दंड के माध्यम से हमारा संघर्ष जारी रहता है। जैसा कि भगवान भगवद् गीता (15.7) में कहते हैं:

"ममैवंशो जीव-लोके

जीव-भूतः सनातनः

मनः शष्ठानीन्द्रियाणि

प्रकृति-स्थाना कार्षति

"इस सशर्त दुनिया में जीवित इकाइयां मेरे शाश्वत, आंशिक हिस्से हैं। सशर्त जीवन के कारण, वे छह इंद्रियों के साथ बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मन भी शामिल है।" जीवित इकाइयां वास्तव में सूक्ष्म रूप हैं जो सर्वोच्च भगवान का हिस्सा और पार्सल हैं। सर्वोच्च भगवान हर चीज में पूरे हैं, और भगवान के छोटे कण भी मूल रूप से उनकी तरह ही योग्य हैं, लेकिन अपने सूक्ष्म अस्तित्व के कारण, वे भौतिक आकर्षण से संक्रमित होते हैं और इस तरह उलझ जाते हैं। इसलिए हमें ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के निर्देशों का पालन करना चाहिए, और फिर, कृष्ण की तरह, जो सृजन, रखरखाव और विनाश की अपनी भौतिक गतिविधियों से कभी नहीं उलझे, हमारे पास विलाप करने के लिए कुछ भी नहीं होगा (नवासिन्ति ये anu ताम)। कृष्ण व्यक्तिगत रूप से भगवद् गीता में निर्देश देते हैं, और इन निर्देशों का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

कृष्ण के निर्देशों का पालन करना तब संभव है जब कोई भक्त हो, क्योंकि कृष्ण निर्देश देते हैं कि व्यक्ति को भक्त बनना चाहिए। मन-मना भव मद्-भक्तो मद्-याजी माम नमस्करु: "हमेशा मेरे बारे में सोचो और मेरा भक्त बनो। मेरी पूजा करो और मुझे अपना सम्मान दो।" (बीजी। 18.65) हमेशा कृष्ण के बारे में सोचने का मतलब है हरे कृष्ण मंत्र का जाप करना, लेकिन जब तक कोई दीक्षित भक्त नहीं बनता वह ऐसा नहीं कर सकता। जैसे ही कोई भक्त बनता है, वह देवता पूजा (मद-याजी) में संलग्न हो जाता है। एक भक्त का व्यवसाय है प्रभु और आध्यात्मिक गुरु को लगातार प्रणाम करना। यह सिद्धांत भक्ति के मंच पर आने का मान्यता प्राप्त तरीका है। जैसे ही कोई इस मंच पर आता है, वह धीरे-धीरे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझता है, और केवल कृष्ण को समझकर ही वह भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)