श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  8.1.12 
न यस्याद्यन्तौ मध्यं च स्व: परो नान्तरं बहि: ।
विश्वस्यामूनि यद् यस्माद् विश्वं च तद‍ृतं महत् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
ईश्वर का न तो आदि है, न अंत है और न बीच। वे किसी व्यक्ति या राष्ट्र के नहीं हैं। उनका कोई भीतर या बाहर नहीं है। इस भौतिक दुनिया में पाए जाने वाले सभी द्वंद्व, जैसे कि शुरुआत और अंत, मेरा और उनका, ये सभी भगवान के व्यक्तित्व में अनुपस्थित हैं। उनसे निकलने वाला ब्रह्मांड ईश्वर की एक और विशेषता है। इसलिए भगवान परम सत्य हैं और उनकी महानता पूर्ण है।
 
The Lord has no beginning, no end and no middle. He does not belong to any individual or nation. He has no inside and no outside. All the dualities seen in this world—such as beginning and end, mine and theirs—are absent in the Personality of the Supreme Being. This universe which emanates from Him is another form of Him. Therefore the Lord is the Absolute Truth and His greatness is complete.
तात्पर्य
भगवान श्रीकृष्ण, जो परमेश्वर हैं, का वर्णन ब्रह्म-संहिता (5.1) में दिया गया है।

ईश्वरः परमः कृष्णः

सच्चिदानन्द-विग्रहः

अनादिर आदिर् गोविन्दः

सर्व-कारण-कारणम्

"भगवान श्रीकृष्ण, जो गोविन्द के नाम से प्रसिद्ध हैं, परम नियंत्रक हैं। उनके लिए शाश्वत, आनंदमय और आध्यात्मिक शरीर है। वह सभी के मूल हैं। उनका कोई और मूल नहीं है क्योंकि वह सभी कारणों का मूल कारण है।" भगवान के अस्तित्व का कोई कारण नहीं है क्योंकि वह सभी कारण हैं। वह हर चीज़ में है (माया ततम इदं सर्वम), वह हर चीज़ में विस्तारित हैं, लेकिन वह सब कुछ नहीं है। वह अचिंत्य-भेदाभेद हैं, एक और अलग दोनों ही हैं। इसे इस श्लोक में बताया गया है। भौतिक स्थिति में, हमारे पास आरंभ, अंत और बीच की धारणा होती है, लेकिन परम भगवान के लिए ऐसी कोई चीज़ नहीं है। सार्वभौमिक ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति विराट-रूप भी है जिसे भगवद् गीता में अर्जुन को दिखाया गया था। इसलिए, क्योंकि भगवान हर जगह और हर समय मौजूद है, वह परम सत्य और महानतम है। वह महानता में पूर्ण हैं। ईश्वर महान हैं, और वह कितने महान हैं, इसे यहाँ समझाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)