श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 37-39
 
 
श्लोक  7.8.37-39 
तत्रोपव्रज्य विबुधा ब्रह्मेन्द्रगिरिशादय: ।
ऋषय: पितर: सिद्धा विद्याधरमहोरगा: ॥ ३७ ॥
मनव: प्रजानां पतयो गन्धर्वाप्सरचारणा: ।
यक्षा: किम्पुरुषास्तात वेताला: सहकिन्नरा: ॥ ३८ ॥
ते विष्णुपार्षदा: सर्वे सुनन्दकुमुदादय: ।
मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटा आसीनं तीव्रतेजसम् ।
ईडिरे नरशार्दुलं नातिदूरचरा: पृथक् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
राजन् युधिष्ठिर जी, तब देवतागण भगवान् के निकट आ गए। उनमें ब्रह्मा जी, इन्द्र जी और शिव जी प्रमुख थे। साथ ही बड़े-बड़े साधु-संत और पितृलोक, सिद्धलोक, विद्याधर लोक और नागलोक के निवासी भी थे। वहीं सभी मनु और अन्य लोकों के प्रजापति भी आ गए। अप्सराओं के साथ-साथ गंधर्व, चारण, यक्ष, किन्नर, बेताल, किम्पुरुष लोक के वासी और विष्णु जी के पार्षद सुनंद और कुमुद आदि भी आ गए। ये सभी भगवान् के निकट आए जो अपने तेज प्रकाश से चमक रहे थे। इन सबों ने अपने सिरों पर हाथ रखकर नमस्कार किया और स्तुतियाँ कीं।
 
राजन् युधिष्ठिर जी, तब देवतागण भगवान् के निकट आ गए। उनमें ब्रह्मा जी, इन्द्र जी और शिव जी प्रमुख थे। साथ ही बड़े-बड़े साधु-संत और पितृलोक, सिद्धलोक, विद्याधर लोक और नागलोक के निवासी भी थे। वहीं सभी मनु और अन्य लोकों के प्रजापति भी आ गए। अप्सराओं के साथ-साथ गंधर्व, चारण, यक्ष, किन्नर, बेताल, किम्पुरुष लोक के वासी और विष्णु जी के पार्षद सुनंद और कुमुद आदि भी आ गए। ये सभी भगवान् के निकट आए जो अपने तेज प्रकाश से चमक रहे थे। इन सबों ने अपने सिरों पर हाथ रखकर नमस्कार किया और स्तुतियाँ कीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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