श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  7.8.30 
संरम्भदुष्प्रेक्ष्यकराललोचनो
व्यात्ताननान्तं विलिहन्स्वजिह्वया ।
असृग्लवाक्तारुणकेशराननो
यथान्त्रमाली द्विपहत्यया हरि: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
भगवान नृसिंहदेव के मुख और उनके गर्दन के बाल रक्त के छींटों से लथपथ थे और क्रोध से भरी हुई उनकी भयानक आँखों की ओर देखना असंभव था। वह अपनी जीभ से अपने मुँह के कोनों को चाट रहे थे और हिरण्यकशिपु के पेट से निकली हुई आँतों की माला उनके गले में थी। वे उस शेर के समान दिखाई दे रहे थे जिसने अभी-अभी किसी हाथी को मारा हो।
 
भगवान नृसिंहदेव के मुख और उनके गर्दन के बाल रक्त के छींटों से लथपथ थे और क्रोध से भरी हुई उनकी भयानक आँखों की ओर देखना असंभव था। वह अपनी जीभ से अपने मुँह के कोनों को चाट रहे थे और हिरण्यकशिपु के पेट से निकली हुई आँतों की माला उनके गले में थी। वे उस शेर के समान दिखाई दे रहे थे जिसने अभी-अभी किसी हाथी को मारा हो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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