श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.8.2 
अथाचार्यसुतस्तेषां बुद्धिमेकान्तसंस्थिताम् ।
आलक्ष्य भीतस्त्वरितो राज्ञ आवेदयद्यथा ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
जब शुक्राचार्य के बेटे षण्ड और अमर्क ने देखा कि राक्षसों के सभी छात्र प्रह्लाद महाराज के साथ उनकी संगति के कारण कृष्ण चेतना में प्रगति कर रहे हैं, तो वे डर गए। इसलिए वे राक्षसराज के पास गए और उन्हें पूरी स्थिति बताई।
 
When Shukracharya's sons Shanda and Amarka saw that all the students were making progress in devotion to Krishna by the association of Asura's son Prahlada Maharaja, they became afraid. Therefore they went to the Asura King and explained the whole situation to him.
तात्पर्य
शब्द बद्धिम एकांत-समस्थिताम् यह दर्शाते हे की प्रहलाद महाराज के उपदेश के प्रभाव स्वरुप, जो छात्र उनको सुनते थे वे इस निष्कर्ष पर दृढ हो जाते थे की कृष्ण चेतना ही मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य अवश्य होता है। तथ्य यह है की जो कोई भी किसी शुद्ध भक्त के साथ सम्बद्धता रखता है और उनके निर्देशों का पालन करता है, वह कृष्ण चेतना में दृढ हो जाता है और भौतिकवादी चेतनाओं से विचलित नहीं होता है। शिक्षकों ने विशेष रूप से इसे उनके छात्रों में देखा, और इसीलिए वे भयभीत थे क्यूंकि छात्रों का पूरा समुदाय धीरे-धीरे कृष्ण चेतन हो रहा था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)