श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  7.6.27 
ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह
नारायणो नरसख: किल नारदाय ।
एकान्तिनां भगवतस्तदकिञ्चनानां
पादारविन्दरजसाप्लुतदेहिनां स्यात् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
परमेश्वर, समस्त जीवों के हितैषी एवं मित्र भगवान् नारायण ने यह दिव्य ज्ञान पहले महान संत नारद को प्रदान किया था। नारद जैसे संत के अनुग्रह के बिना इस ज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है, परंतु जिस किसी ने भी नारद की शिष्य परंपरा की शरण ली है, वह यह गुह्य ज्ञान समझ सकता है।
 
परमेश्वर, समस्त जीवों के हितैषी एवं मित्र भगवान् नारायण ने यह दिव्य ज्ञान पहले महान संत नारद को प्रदान किया था। नारद जैसे संत के अनुग्रह के बिना इस ज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है, परंतु जिस किसी ने भी नारद की शिष्य परंपरा की शरण ली है, वह यह गुह्य ज्ञान समझ सकता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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