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श्लोक 7.6.15  |
वित्तेषु नित्याभिनिविष्टचेता
विद्वांश्च दोषं परवित्तहर्तु: ।
प्रेत्येह वाथाप्यजितेन्द्रियस्त-
दशान्तकामो हरते कुटुम्बी ॥ १५ ॥ |
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| अनुवाद |
| यदि कोई व्यक्ति पारिवारिक भरण-पोषण के कर्तव्यों में इतना लिप्त रहता है कि वह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता और उसका मन हमेशा धन इकट्ठा करने में लगा रहता है। हालांकि वह जानता है कि जो दूसरे का धन हड़पता है, उसे सरकार के नियमों और मृत्यु के बाद यमराज के नियमों के अनुसार दंडित किया जाएगा। तो भी वह धन प्राप्त करने के लिए दूसरों को धोखा देता रहता है। |
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| यदि कोई व्यक्ति पारिवारिक भरण-पोषण के कर्तव्यों में इतना लिप्त रहता है कि वह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता और उसका मन हमेशा धन इकट्ठा करने में लगा रहता है। हालांकि वह जानता है कि जो दूसरे का धन हड़पता है, उसे सरकार के नियमों और मृत्यु के बाद यमराज के नियमों के अनुसार दंडित किया जाएगा। तो भी वह धन प्राप्त करने के लिए दूसरों को धोखा देता रहता है। |
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