निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा ।
गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधर: ॥ २५ ॥
अनुवाद
अपने पुत्र प्रह्लाद के मुंह से भक्ति के ये वचन सुनकर हिरण्यकशिपु क्रोध से भड़क उठा। उसने काँपते होठों से अपने गुरु शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड से इस प्रकार कहा।
Hearing these words from his son Prahlad, Hiranyakashipu became very angry. With trembling lips he said this to Shanda, the son of his Guru Shukracharya.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)