| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान » अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक » श्लोक 43 |
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| | | | श्लोक 7.4.43  | तस्मिन्महाभागवते महाभागे महात्मनि ।
हिरण्यकशिपू राजन्नकरोदघमात्मजे ॥ ४३ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे राजा युधिष्ठिर, उस असुर हिरण्यकशिपु ने इस महान भाग्यशाली भक्त प्रह्लाद को कष्ट दिया था, हालाँकि प्रह्लाद उसका अपना पुत्र था। | | | | हे राजा युधिष्ठिर, उस असुर हिरण्यकशिपु ने इस महान भाग्यशाली भक्त प्रह्लाद को कष्ट दिया था, हालाँकि प्रह्लाद उसका अपना पुत्र था। | | ✨ ai-generated | | |
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