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श्लोक 7.4.40  |
नदति क्वचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् ।
क्वचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह ॥ ४० ॥ |
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| अनुवाद |
| कभी भगवान के दर्शन कर प्रह्लाद महाराज उत्सुकतावश जोर से पुकारते। कभी हर्ष व उल्लास में विस्मृत होकर नाचने लगते। कभी-कभी कृष्ण के भावों में डूबकर वे भगवान से एकाकार होने की अनुभूति करते और उनकी लीलाओं का अनुकरण करते। |
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| कभी भगवान के दर्शन कर प्रह्लाद महाराज उत्सुकतावश जोर से पुकारते। कभी हर्ष व उल्लास में विस्मृत होकर नाचने लगते। कभी-कभी कृष्ण के भावों में डूबकर वे भगवान से एकाकार होने की अनुभूति करते और उनकी लीलाओं का अनुकरण करते। |
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