| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान » अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक » श्लोक 35 |
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| | | | श्लोक 7.4.35  | यं साधुगाथासदसि रिपवोऽपि सुरा नृप ।
प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवादृशा: ॥ ३५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे राजा युधिष्ठिर जी, किसी भी ऐसी सभा में जहाँ सन्तों तथा भक्तों की चर्चा होती है वहाँ पर देवतागण, जो असुरों के शत्रु हैं, तक भी प्रह्लाद महाराज को एक महान भक्त के रूप में उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। आप की तो बात ही अलग है जो हमेशा प्रह्लाद महाराज का उदाहरण देते रहते हैं। | | | | हे राजा युधिष्ठिर जी, किसी भी ऐसी सभा में जहाँ सन्तों तथा भक्तों की चर्चा होती है वहाँ पर देवतागण, जो असुरों के शत्रु हैं, तक भी प्रह्लाद महाराज को एक महान भक्त के रूप में उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। आप की तो बात ही अलग है जो हमेशा प्रह्लाद महाराज का उदाहरण देते रहते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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