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श्लोक 7.4.19  |
स इत्थं निर्जितककुबेकराड् विषयान् प्रियान् ।
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रिय: ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| सभी दिशाओं को जीतने की शक्ति प्राप्त करने के बावजूद और सभी प्रकार के प्रिय इंद्रिय सुखों का यथासंभव भोग करने के बाद भी हिरण्यकशिपु असंतुष्ट रहा, क्योंकि वह अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने के बजाय उनका दास बना रहा। |
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| सभी दिशाओं को जीतने की शक्ति प्राप्त करने के बावजूद और सभी प्रकार के प्रिय इंद्रिय सुखों का यथासंभव भोग करने के बाद भी हिरण्यकशिपु असंतुष्ट रहा, क्योंकि वह अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने के बजाय उनका दास बना रहा। |
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