Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 7.4.15: वर्ण और आश्रम के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करने वाले पुरुषों द्वारा बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञ करके की जाने वाली पूजा को स्वीकारते हुए, हिरण्यकश्यप ने देवताओं को चढ़ाई जाने वाली आहुतियों के हिस्सों को उन्हें देने के बजाय, स्वयं ही ले लिया। | bhagavat अध्याय 7.4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक । bhagavat स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स एव वर्णाश्रमिभि: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: ।
इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ १५ ॥
अनुवाद
वर्ण और आश्रम के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करने वाले पुरुषों द्वारा बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञ करके की जाने वाली पूजा को स्वीकारते हुए, हिरण्यकश्यप ने देवताओं को चढ़ाई जाने वाली आहुतियों के हिस्सों को उन्हें देने के बजाय, स्वयं ही ले लिया।
Men who followed the Varnashram Dharma would worship him by performing yagnas with huge dakshina, but instead of giving the sacrificial offerings to the gods, he would take the offerings of the yagna himself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥