श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.4.14 
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं
विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादय: ।
गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहु-
र्विद्याधराश्चाप्सरसश्च पाण्डव ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुनंदन महाराज युधिष्ठिर, हिरण्यकशिपु ने अपने बाहुबल से राजा इन्द्र के सिंहासन पर आधिपत्य कर लिया और अन्य सभी लोकों के निवासियों को अपने वश में कर लिया। विश्वावसु और तुम्बुरु नाम के दो गंधर्व, मैं स्वयं और विद्याधर, अप्सराएं और ऋषिगण, सभी ने उसके यशोगान के लिए उसकी बार-बार स्तुति की।
 
O King Yudhishthira, descendant of Pandu, Hiranyakshipu, having occupied the throne of King Indra, subdued the inhabitants of all the other worlds by his personal power. The two Gandharvas, Visvavasu and Tumburu, I and the Vidyadharas, the Apsaras and the sages repeatedly hymned to glorify him.
तात्पर्य
कभी-कभी असुर इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि वे नारद मुनि जैसे भक्तों को भी अपनी सेवा में लगा लेते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि नारद हिरण्यकशिपु के अधीन थे। लेकिन यहाँ की भौतिक सृष्टि में कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि महान व्यक्तित्व, यहाँ तक की महान भक्त भी, असुरों के नियंत्रण में आ जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)