श्रीनारद उवाच
एवं वृत: शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान् ॥ १ ॥
अनुवाद
नारद मुनि ने कहा: ब्रह्मा जी हिरण्यकशिपु की मुश्किल साधना से अत्यंत प्रसन्न थे। इसलिए, जब उसने उनसे वरदान माँगे, तो उन्होंने निःसंदेह वे दुर्लभ वरदान दे दिए।
Narada Muni said: Brahmaji was very pleased with the difficult penance of Hiranyakashipu. Therefore, when he asked for boons from them, they undoubtedly provided those rare boons.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥