श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  7.3.36 
नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधै: ।
न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
मुझे यह वरदान प्रदान करें कि मेरी मृत्यु किसी भी निवास के भीतर या बाहर, दिन के समय या रात में, जमीन पर या आकाश में ना हो। मुझे यह वरदान दें कि मेरी मृत्यु आपके द्वारा रचे गए जीवों से इतर किसी अन्य प्राणी, किसी हथियार, किसी मनुष्य या पशु के द्वारा ना हो।
 
Grant me this boon that I should not die either inside the house or outside the house, neither during the day nor at night, neither on the ground nor in the sky. Grant me this boon that my death should not be caused by anyone other than the creatures created by you, nor by any weapon, nor by any human or animal.
तात्पर्य
हिराण्यकश्यप उससे डरते थे क्योंकि उनके भाई को विष्णु ने वराह का रुप लेकर मार दिया था। इसिलिए वह सब तरह के जानवरों से सावधान रहते थे । मगर भगवन विष्णु बिना जानवर बने भी उनका सुदर्शन चक्र चलाकर मार सकते थे जो बिना उनके वहाँ उपस्थित हुए ही कहीं भी जा सकता है। इसिलिए वह सभी तरह के शस्त्रों से भी सावधान रहते थे। वह सभी तरह के समय, स्थानों और देशों से भी सावधान रहते थे क्योंकि उन्हें इस डर का था कि कोई और उन्हें किसी दूसरे देश में मार न दे। और भी बहुत से ग्रह हैं छोटे और बड़े इसिलिए उन्होंने प्रार्थना की कि किसी भी ग्रह का कोई भी जीव उन्हें न मारे। तीन श्रेष्ठ देव हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर। हिराण्यकश्यप को पता था कि ब्रह्मा उन्हें नहीं मारेंगे मगर वह नहीं चाहते थे कि विष्णु या शिव भी उन्हें मारें। इसिलिए उन्होंने इस तरह के वरदान की प्रार्थना की। इस प्रकार हिराण्यकश्यप खुद को इस ब्रम्हांड के अंदर किसी भी प्राणी के हाथों होने वाले मौत से सुरक्षित समझते थे। वह प्राकृतिक मृत्यु से भी सावधान थे जो घर के अंदर या बाहर हो सकती थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)