श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.3.22 
श्रीनारद उवाच
इत्युक्त्वादिभवो देवो भक्षिताङ्गं पिपीलिकै: ।
कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
श्री नारद मुनि ने आगे कहा : हिरण्यकशिपु से ये शब्द कहने के बाद इस ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्माजी ने, जो अत्यंत शक्तिमान हैं, उसके शरीर पर अपने कमंडल से दिव्य अचूक आध्यात्मिक जल छिड़का, जिसे चींटियों तथा कीड़े-मकोड़ों ने खा लिया था। इस तरह उन्होंने हिरण्यकशिपु को पुनर्जीवित कर दिया।
 
Sri Narada Muni further said: After Hiranyakashipu had said these words, Brahma, the first living entity of this universe, who is extremely powerful, sprinkled divine infallible spiritual water from his kamandalu on his body, which was eaten by ants and insects. In this way, he brought Hiranyakashipu back to life.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा इस ब्रह्मांड के पहले सृजित प्राणी हैं जिन्हें सर्वोच्च भगवान ने सृजन का अधिकार दिया है। तेने ब्रह्म हृदया आदी-कवये: आदि-देव या आदि-कवि - प्रथम जीव - को स्वयं भगवान ने हृदय के माध्यम से शिक्षा दी थी। उन्हें कोई शिक्षित करने वाला नहीं था, लेकिन चूंकि भगवान ब्रह्मा के हृदय में ही विराजते हैं, इसलिए उनकी शिक्षा स्वयं भगवान द्वारा ही की गई थी। विशेष रूप से अधिकार प्राप्त भगवान ब्रह्मा जो कुछ भी चाहते हैं, उसमें अचूक होते हैं। यह शब्द अमोग-राधासा के अर्थ का निरूपण है। वह हिरण्यकश्यपु के मूल शरीर को बहाल करना चाहते थे, और इसलिए, अपने कमंडल से दिव्य जल छिड़क कर उन्होंने तुरंत वैसा ही किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)