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स तेपे मन्दरद्रोण्यां तप: परमदारुणम् ।
ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टि: पादाङ्गुष्ठाश्रितावनि: ॥ २ ॥
अनुवाद
मन्दर पर्वत की घाटी में, हिरण्यकशिपु ने अपने पाँव के अंगूठे जमीन पर टिकाकर, हाथ ऊपर उठाए और आसमान की ओर देखते हुए अपनी तपस्या शुरू की। यह एक अत्यंत कठिन स्थिति थी, परंतु उन्होंने इसे सिद्धि प्राप्त करने के लिए स्वीकार कर लिया।
Hiranyakashipu began his penance in the valley of Mount Mandara, standing on the ground on his toes, with his arms raised and looking towards the sky. This posture was extremely difficult, but he accepted it in order to achieve siddhi.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥