श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  7.2.49 
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्विद: ।
नान्यथा शक्यते कर्तुं स्वभाव: शोचतामिति ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
जिनको आत्मज्ञान का पूरा ज्ञान हो, जो ठीक से जानते हैं कि आत्मा शाश्वत है जबकि शरीर नश्वर है, वे विलाप से पराजित नहीं होते। परन्तु जो लोग आत्मज्ञान से वंचित रहते हैं, वे निश्चित तौर पर विलाप करते हैं। इसलिए, भ्रम में पड़े व्यक्ति को शिक्षित करना कठिन है।
 
जिनको आत्मज्ञान का पूरा ज्ञान हो, जो ठीक से जानते हैं कि आत्मा शाश्वत है जबकि शरीर नश्वर है, वे विलाप से पराजित नहीं होते। परन्तु जो लोग आत्मज्ञान से वंचित रहते हैं, वे निश्चित तौर पर विलाप करते हैं। इसलिए, भ्रम में पड़े व्यक्ति को शिक्षित करना कठिन है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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