श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  7.2.46 
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभु: ।
भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
पाँच भौतिक तत्व, दस इन्द्रियाँ तथा मन मिलकर स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के विभिन्न अंगों का निर्माण करते हैं। जीव इन भौतिक शरीरों के सम्पर्क में आता है, जो उच्च या निम्न श्रेणी का हो सकता है। बाद में अपनी शक्ति से इन शरीरों को छोड़ देता है। जीव की विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करने की क्षमता उसकी निजी शक्ति है।
 
The five physical elements, the ten senses and the mind—all these together form the various parts of the gross and subtle bodies. The living entity comes into contact with his physical bodies, whether higher or lower, and later discards them by his own power. This power can be seen in the personal power of the living entity, by which he can assume different types of bodies.
तात्पर्य
शर्त付き आत्‍मा के पास ज्ञान है और यदि वह अपने जीवन में वास्तविक उन्नति के लिए अपने स्‍थूल और सूक्ष्‍म शरीरों का पूरा उपयोग करना चाहता है तो ऐसा कर सकता है। इसलिए यहाँ यह कहा गया है कि अपनी उच्‍च बुद्धि (स्‍वेन तेजसा) से और सही स्रोत से प्राप्‍त उच्‍चतर ज्ञान की शक्ति से ─ आध्‍यात्मिक गुरु या आचार्य ─ वह भौतिक शरीर में अपने शर्तों से बंधे हुए जीवन को छोड़कर अपने घर, भगवान के पास लौट सकता है। हालाँकि, यदि वह खुद को इस भौतिक दुनिया के अंधकार में रखना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। श्रीमद्भगवत गीता (9.25) में भगवान इस बात की पुष्टि इस प्रकार करते हैं :

याँति देव-व्रता देवान्

पितृन् याँति पितृ-व्रता:

भूतानि याँति भूतेज्या

याँति मद-याजिनोऽपि माम्

“जो देवताओं को पूजता है, वह देवताओं के बीच जन्‍म लेगा; जो प्रेत और आत्‍माओं को पूजता है, वह ऐसे प्राणियों के बीच जन्‍म लेगा; जो पुरखों को पूजता है, वह पुरखों के बीच जाता है; और जो मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ रहेगा।”

शरीर का मनुष्‍य रूप मूल्यवान है। व्‍यक्ति इस शरीर का उपयोग उच्‍च ग्रह प्रणालियों में जाने के लिए, पितृलोक में जाने के लिए कर सकता है या वह इसी निचली ग्रह प्रणाली में रह सकता है, लेकिन यदि कोई प्रयास करता है तो वह अपने घर, भगवान के पास भी लौट सकता है। यह क्षमता सर्वोच्‍च ईश्‍वर द्वारा परमात्‍मा के रूप में दी जाती है। इसलिए भगवान कहते हैं, मत्‍ता: स्‍मृतिर् ज्ञानमपोहनं च: “मुझसे स्‍मरण, ज्ञान और विस्‍मरण आता है।” यदि कोई सर्वोच्‍च ईश्‍वर से वास्‍तविक ज्ञान प्राप्‍त करना चाहता है तो वह भौतिक शरीरों को बार-बार स्‍वीकार करने की गुलामी से मुक्‍त हो सकता है। यदि कोई भगवान की भक्ति सेवा में आता है और उसके प्रति समर्पण करता है तो भगवान उसे दिशा-निर्देश देने के लिए तैयार हैं जिसके द्वारा वह अपने घर, भगवान के पास लौट सके, लेकिन यदि कोई मूर्खतापूर्ण रूप से खुद को अंधकार में रखना चाहता है तो वह भौतिक अस्तित्‍व के जीवन में जारी रह सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)