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श्लोक 7.2.45  |
न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसु: ।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्य: प्राणदेहयो: ॥ ४५ ॥ |
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| अनुवाद |
| शरीर में सबसे महत्वपूर्ण तत्व प्राण है, पर वह भी ना सुनने वाला है और ना बोलने वाला। यहाँ तक कि प्राण के भी परे आत्मा भी कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वास्तविक रूप से परमात्मा ही सबका संचालक है और वो जीव आत्मा के साथ मिलकर काम करता है। शरीर की गतिविधियों को संचालित करने वाला परमात्मा शरीर और प्राण से अलग है। |
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| शरीर में सबसे महत्वपूर्ण तत्व प्राण है, पर वह भी ना सुनने वाला है और ना बोलने वाला। यहाँ तक कि प्राण के भी परे आत्मा भी कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वास्तविक रूप से परमात्मा ही सबका संचालक है और वो जीव आत्मा के साथ मिलकर काम करता है। शरीर की गतिविधियों को संचालित करने वाला परमात्मा शरीर और प्राण से अलग है। |
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