श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.2.44 
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
य: श्रोता योऽनुवक्तेह स न द‍ृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
यमराज ने आगे कहा: हे विलाप करने वालों, तुम सभी मूर्ख हो! तुम जिस सुयज्ञ नामक व्यक्ति के लिए विलाप कर रहे हो, वह तुम्हारे सामने अभी भी लेटा हुआ है। वह कहीं नहीं गया। तो फिर तुम्हारे विलाप का क्या कारण है? पहले वह तुम्हारी बातें सुनता था और उत्तर देता था, लेकिन अब उसे न पाकर तुम लोग शोक कर रहे हो। यह विरोधाभासी व्यवहार है, क्योंकि तुमने वास्तव में उस व्यक्ति को शरीर के अंदर कभी नहीं देखा, जो तुम्हें सुनता और उत्तर देता था। तुम्हें शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम जिस शरीर को हमेशा देखते आए हो, वह तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।
 
यमराज ने आगे कहा: हे विलाप करने वालों, तुम सभी मूर्ख हो! तुम जिस सुयज्ञ नामक व्यक्ति के लिए विलाप कर रहे हो, वह तुम्हारे सामने अभी भी लेटा हुआ है। वह कहीं नहीं गया। तो फिर तुम्हारे विलाप का क्या कारण है? पहले वह तुम्हारी बातें सुनता था और उत्तर देता था, लेकिन अब उसे न पाकर तुम लोग शोक कर रहे हो। यह विरोधाभासी व्यवहार है, क्योंकि तुमने वास्तव में उस व्यक्ति को शरीर के अंदर कभी नहीं देखा, जो तुम्हें सुनता और उत्तर देता था। तुम्हें शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम जिस शरीर को हमेशा देखते आए हो, वह तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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