जिस प्रकार एक गृहस्वामी अपने घर से भिन्न होते हुए भी अपने घर को अपने समान समझता है, उसी तरह अज्ञान के कारण बद्ध आत्मा इस शरीर को स्वयं समझती है, हालाँकि शरीर आत्मा से वास्तव में अलग है। यह शरीर पृथ्वी, जल और अग्नि के अंशों के मिलने से प्राप्त होता है और जब वे समय के साथ बदलते हैं, तो शरीर नष्ट हो जाता है। आत्मा को शरीर के इस सृजन और विनाश से कोई लेना-देना नहीं है।
Just as a householder considers his house to be separate from him, even though it is separate from him, so the conditioned soul, out of ignorance, considers the body to be the soul, although the body is actually different from the soul. The body is obtained by the combination of the parts of earth, water and fire, and when they are transformed in the course of time, the body perishes. The soul has nothing to do with the creation and dissolution of the body.
तात्पर्य
हम एक भ्रामक शरीर से दुसरे भ्रामक शरीर में भ्रमण करते हैं, पर आत्मा रूप में हम हमेशा संसारी जीवन से अलग ही रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक घर या कार हमेशा उसके मालिक से अलग है, पर आसक्ति के कारण सांसारिक प्राणी अपने आप को उसके समान मानता है। एक कार या घर मूल रूप से भौतिक चीज़ों से मिलकर बना है। जब तक भौतिक चीजें सही तरीके से मिलकर रहेंगी तब तक कार या घर ठीक रहता है, और जब चीज़ें अलग-अलग हो जाएंगी तब घर या कार भी अलग-अलग हो जाएंगे। परन्तु, आत्मा हमेशा वैसी ही बनी रहती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)