श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.2.3 
करालदंष्ट्रोग्रद‍ृष्टय‍ा दुष्प्रेक्ष्यभ्रुकुटीमुख: ।
शूलमुद्यम्य सदसि दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
अपने भयानक दाँत, उग्र दृष्टि और तनी हुई भौंहों को दिखाते हुए, देखने में भयावह वह अपने त्रिशूल को उठाए हुए था और अपने इकट्ठा हुए दुष्ट साथियों से इस प्रकार बोला।
 
Terrible to look at, baring his terrible teeth, fierce gaze and wrathful eyebrows, he took up his trident and spoke as follows to his assembled demon companions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)