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श्लोक 7.2.23  |
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते चलतीव भू: ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| नदी के किनारे लगे वृक्षों का जल में परावर्तन होकर चलते हुए दिखना जल की गति के कारण होता है। उसी तरह मानसिक असंतुलन की स्थिति में जब आँखें हिलती हैं, तब भी भूमि (स्थल) घूमती हुई दिखाई देती है। |
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| नदी के किनारे लगे वृक्षों का जल में परावर्तन होकर चलते हुए दिखना जल की गति के कारण होता है। उसी तरह मानसिक असंतुलन की स्थिति में जब आँखें हिलती हैं, तब भी भूमि (स्थल) घूमती हुई दिखाई देती है। |
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