गुणैः कर्माणि सर्वशः
अहङ्कार-विमूढात्मा
कर्ताहं इति मन्यते
"उपर्युक्त तीन गुणों के प्रभाव में भ्रमित प्राणी स्वयं को कर्मों का कर्त्ता समझता है, जो वास्तव में प्रकृति द्वारा सम्पादित किये जाते हैं।" (भगवद्गीता 3.27) सभी जीव प्रकृति के निर्देशानुसार ही कार्य करते हैं क्योंकि भौतिक जगत में हम पूर्ण रूप से उच्चतर नियंत्रण में हैं। इस भौतिक संसार के सभी जीव यहाँ केवल इसलिए आये हैं क्योंकि वे भगवान कृष्ण के समान आनंद लेना चाह रहे थे और अब उन्हें भौतिक प्रकृति के अधीन रहते हुए यहाँ अलग-अलग परिस्थितियों में रहना पड़ा है। भौतिक जगत में इस कार्यकाल को पूर्ण करने के लिए तथाकथित एक घर में एक परिवार कई व्यक्तियों का समूह है। जैसे ही अपराधियों की सज़ा समाप्त हो जाती है और उन्हें मुक्त कर दिया जाता है और वे इधर-उधर भाग जाते हैं, वैसे ही हम सभी जो अस्थायी रूप से परिवार के रूप में एकत्रित हुए हैं, हम अपने गंतव्य की ओर वापस लौट जाएँगे। एक और उदाहरण दिया जाता है कि परिवार के सदस्य नदी की लहरों से बह कर आये पुआलों की तरह हैं। कभी-कभी ऐसे पुआल झरने में एक साथ मिल जाते हैं और बाद में उन्हीं लहरों द्वारा बिखर कर पानी में अलग-अलग बहने लगते हैं। हालाँकि हिरण्यकशिपु एक दैत्य था, परन्तु उसे वैदिक ज्ञान और समझ थी। इस प्रकार उसने अपने परिवार के सदस्यों - उसकी भाभी, माँ और भतीजों को काफी अच्छी सलाह दी। दानवों को ज्ञान में उच्च समझा जाता है, परन्तु क्योंकि वे अपनी बुद्धि को प्रभु की सेवा में नहीं लगाते, इसलिए उन्हें दानव कहा जाता है। इसके विपरीत, देवता भगवान को प्रसन्न करने के लिए बहुत बुद्धिमानी से कार्य करते हैं। श्रीमद् भागवतम् (1.2.13) में इस की पुष्टि इस प्रकार की गयी है:
अतः पुंभीर् द्विज-श्रेष्ठा
वर्णाश्रम-विभागशः
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य
सं सिद्धिर् हरि-तोषणम
"हे द्विजों में श्रेष्ठ, इसलिए यह निष्कर्ष है कि कोई मनुष्य अपने धर्मों का पालन जाति और जीवन के आश्रमों के अनुसार करके जो सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वह है भगवान हरि को प्रसन्न करना।" भगवान को प्रसन्न करने हेतु किसी को भी देवता बनना हो या दिव्य बनना हो, किसी को भी अपने कर्म करना चाहिए।
