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श्लोक 7.2.16  |
एवं विप्रकृते लोके दैत्येन्द्रानुचरैर्मुहु: ।
दिवं देवा: परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिता: ॥ १६ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार हिरण्यकशिपु के अनुयायियों की बार-बार की अप्राकृतिक घटनाओं के कारण सभी लोग परेशान हो गये। वैदिक संस्कृति की सभी गतिविधियाँ बन्द हो गईं। यज्ञों का फल न मिलने से देवतागण भी विचलित हो गये। उन्होंने स्वर्गलोक के अपने आवास त्याग दिये और असुरों से छिपकर पृथ्वी पर विनाश का अवलोकन करने लगे। |
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| इस प्रकार हिरण्यकशिपु के अनुयायियों की बार-बार की अप्राकृतिक घटनाओं के कारण सभी लोग परेशान हो गये। वैदिक संस्कृति की सभी गतिविधियाँ बन्द हो गईं। यज्ञों का फल न मिलने से देवतागण भी विचलित हो गये। उन्होंने स्वर्गलोक के अपने आवास त्याग दिये और असुरों से छिपकर पृथ्वी पर विनाश का अवलोकन करने लगे। |
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