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bhagavat 7.15.63: जब कोई मनुष्य यह समझ पाता है कि परिणाम और कारण एक हैं और द्वैत अंततः अवास्तविक है, जैसे यह विचार कि कपड़े के धागे कपड़े से भिन्न हैं, तो वह एकता की अवधारणा तक पहुँच जाता है जिसे भावद्वैत कहा जाता है।   |   bhagavat अध्याय 7.15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश   ।   bhagavat स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.15.63 
कार्यकारणवस्त्वैक्यदर्शनं पटतन्तुवत् ।
अवस्तुत्वाद्विकल्पस्य भावाद्वैतं तदुच्यते ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
जब कोई मनुष्य यह समझ पाता है कि परिणाम और कारण एक हैं और द्वैत अंततः अवास्तविक है, जैसे यह विचार कि कपड़े के धागे कपड़े से भिन्न हैं, तो वह एकता की अवधारणा तक पहुँच जाता है जिसे भावद्वैत कहा जाता है।
 
When a man understands that the cause and the effect are one and that duality is ultimately as unreal as the idea that the threads of a cloth are different from the cloth, he attains the state of oneness, which is called Bhavaadvaita.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)