श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  7.15.30 
यश्चित्तविजये यत्त: स्यान्नि:सङ्गोऽपरिग्रह: ।
एको विविक्तशरणो भिक्षुर्भैक्ष्यमिताशन: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जो मन पर विजय प्राप्त करना चाहे उसे अपने परिवार का साथ छोड़कर, दूषित संगति से मुक्त एकांत स्थान में रहना चाहिए। अपने शरीर के लिए उसे उतना ही मांगना चाहिए जितने से जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये।
 
He who wishes to conquer his mind should leave his family and live in a solitary place free from polluting company. He should ask for only that much for his bodily sustenance which fulfills the minimum needs of life.
तात्पर्य
मन का विक्षेप जीतने की यह प्रक्रिया है। परिवार छोड़कर अकेले रहने की सलाह दी जाती है। भिक्षा मांगकर शरीर व आत्मा का पोषण करना और जीवित रहने के लिए जितनी जरूरत हो उतना ही भोजन करना चाहिए। ऐसी प्रक्रिया के बगैर व्यक्ति कामुक इच्छाओं पर विजय नहीं पा सकता। सन्यास का मतलब भिक्षा ग्रहण करने वाले जीवन को स्वीकार करना होता है, जो व्यक्ति को अपने आप बहुत ही विनम्र, नम्र और कामुक इच्छाओं के बंधन से मुक्त कर देता है। इसे लेकर स्मृति साहित्य में निम्न श्लोक मिलता हैः

द्वंद्वाहतस्य गार्हस्थ्यं

ध्यान-भंगादि-कारणम्

लक्षयित्वा गृही स्पष्टं

सन्यसेद अविचारयन्

इस द्वैत के संसार में पारिवारिक जीवन व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन या ध्यान को नष्ट करने वाला कारण है। इस तथ्य को स्पष्ट रूप से समझते हुए व्यक्ति को संन्यास के नियम को बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)