| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान » अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन » श्लोक 39 |
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| | | | श्लोक 7.14.39  | दृष्ट्वा तेषां मिथो नृणामवज्ञानात्मतां नृप ।
त्रेतादिषु हरेरर्चा क्रियायै कविभि: कृता ॥ ३९ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे राजन, जब त्रेतायुग के शुरू में ही ऋषि-मुनियों ने देखा कि लोग एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते और आपस में अनादरपूर्ण व्यवहार करते हैं, तब मंदिरों में भगवान की मूर्ति की पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हुई। | | | | हे राजन, जब त्रेतायुग के शुरू में ही ऋषि-मुनियों ने देखा कि लोग एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते और आपस में अनादरपूर्ण व्यवहार करते हैं, तब मंदिरों में भगवान की मूर्ति की पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हुई। | | ✨ ai-generated | | |
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