श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.14.17 
न ह्यग्निमुखतोऽयं वै भगवान्सर्वयज्ञभुक् ।
इज्येत हविषा राजन्यथा विप्रमुखे हुतै: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
परमेश्वर श्री कृष्ण सभी यज्ञों की आहुतियों के भोक्ता हैं। यद्यपि वे अग्नि में डाली गई आहुतियों का भोग करते हैं, फिर भी हे राजन, जब उन्हें अन्न और घी से बना हुआ व्यंजन योग्य ब्राह्मणों के मुँह से होकर अर्पित किया जाता है, तो वे और भी प्रसन्न होते हैं।
 
परमेश्वर श्री कृष्ण सभी यज्ञों की आहुतियों के भोक्ता हैं। यद्यपि वे अग्नि में डाली गई आहुतियों का भोग करते हैं, फिर भी हे राजन, जब उन्हें अन्न और घी से बना हुआ व्यंजन योग्य ब्राह्मणों के मुँह से होकर अर्पित किया जाता है, तो वे और भी प्रसन्न होते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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