श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.14.15 
देवानृषीन् नृभूतानि पितृनात्मानमन्वहम् ।
स्ववृत्त्यागतवित्तेन यजेत पुरुषं पृथक् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
मानव को प्रत्येक दिन उस परम पुरुष की आराधना करनी चाहिए जो प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करते हैं और उसी आधार पर उसे देवताओं, संतों, सामान्य मानवों और जीवों, पूर्वजों और स्वयं की अलग-अलग वंदना करनी चाहिए। इस प्रकार वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित परम पुरुष की उपासना करने में समर्थ हो सकेगा।
 
A man should worship the Supreme Being daily who is situated in the heart of everyone and on this basis he should worship the gods, saints, ordinary humans and creatures, his ancestors and himself separately. In this way he can worship the Supreme Being who is situated in the heart of everyone.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)