अव्यक्तलिङ्गो व्यक्तार्थो मनीष्युन्मत्तबालवत् ।
कविर्मूकवदात्मानं स दृष्टया दर्शयेन्नृणाम् ॥ १० ॥
अनुवाद
पुजनीय व्यक्ति मानव समाज की दृष्टि में अपना परिचय नहीं देता है लेकिन उनके व्यवहार से उनका उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। उन्हें मानव समाज के बीच अपने आपको एक चंचल बालक के रूप में प्रदर्शित करना चाहिए, और सर्वोत्तम विचारशील वक्ता होने के बाद भी उन्हें स्वयं को एक मूक व्यक्ति के समान प्रस्तुत करना चाहिए।
A saintly person may not reveal himself to the human society, but his conduct reveals his purpose. He should present himself to the human society like a playful child and even if he is the best speaker, he should present himself as a mute person.
तात्पर्य
कृष्ण भावना में अत्यधिक उन्नति करने वाला कोई महान व्यक्ति संन्यासी के चिन्हों से न पहचाना जा सकता है। अपने को ढँकने के लिए वह एक उद्दंड बच्चे अथवा एक मूक व्यक्ति, की भांति रह सकता है यद्यपि वह महान वक्ता या कवि होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥