श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 12: पूर्ण समाज : चार आध्यात्मिक वर्ग  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.12.8 
केशप्रसाधनोन्मर्दस्‍नपनाभ्यञ्जनादिकम् ।
गुरुस्त्रीभिर्युवतिभि: कारयेन्नात्मनो युवा ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
यदि गुरु पत्नी जवान हो, तो युवा ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह न तो उनसे अपने बाल कढ़वाए, न ही शरीर में तेल मालिश करवाए और न ही वो उन्हें माँ की तरह प्यार से स्नान कराने दे।
 
If the Guru's wife is a young woman, the young brahmacari should neither get his hair braided by her, nor get his body massaged with oil, nor allow her to bathe him with motherly love.
तात्पर्य
छात्र अथवा शिष्य और गुरु या आचार्य की पत्नी के संबंध माँ तथा भाई के तरह ही होते हैं। कभी-कभी माँ अपने पुत्र के बाल संवारती है, तेल मालिश करती है, अथवा नहलाती है। उसी प्रकार गुरु की पत्नी भी माँ (गुरु-पत्नी) ही होती है, इसलिए वह भी माँ के समान ही शिष्य की देखभाल कर सकती है। किंतु यदि गुरु-पत्नी युवा है, तब एक ब्रह्मचारी शिष्य को ऐसी माँ का अपने ऊपर स्पर्श नहीं करने देना चाहिए। यह सर्वथा वर्जित है। सात प्रकार की माताएँ होती हैं:

आत्म मता गुरोः पत्नी

ब्राह्मणी राज पत्निका

धेनुर्धात्री तथा पृथ्वी

सप्तैता मात्रः स्मृताः

ये माताएँ हैं- असली माँ, गुरु या आचार्य की पत्नी, ब्राह्मण की पत्नी, राजा की पत्नी, गाय, धाय और पृथ्वी। महिलाओं के साथ अनावश्यक संगति यहाँ तक कि अपनी माँ, बहिन या पुत्र के साथ भी वर्जित है। यही मानव सभ्यता है। ऐसी सभ्यता जहाँ पुरुषों को महिलाओं के साथ अबाध मिलने-जुलने की छूट हो पशुवत सभ्यता है। कलियुग में लोग अत्यंत उदार होते हैं किंतु महिलाओं के साथ घुलना-मिलना और उन्हें अपने बराबर मानकर बातें करना वास्तव में असभ्यता का लक्षण है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)